वो वेश्या नहीं थी...
शाम ढल रही थी। सूरज की लालिमा धीरे-धीरे अंधेरे में घुल रही थी। मैं रोज की तरह अपनी कोचिंग से लौट रहा था, जब रेलवे स्टेशन के पास वह बूढ़ी भिखारिन दिखी—हर दिन की तरह, वही फटे-पुराने कपड़े, वही झुकी हुई कमर, और वही डर से कांपती आँखें।
लेकिन एक बात जो मुझे सबसे ज्यादा चुभती थी—हर शाम दो आदमी आते, उससे पैसे लेते और चले जाते। औरत उन दोनों को देखकर घबरा जाती थी, जैसे कोई छुपा हुआ डर उसकी रगों में दौड़ पड़ता हो।
मुझे लगा, शायद ये उसके रिश्तेदार होंगे। लेकिन अगर ऐसा होता, तो उसकी आँखों में इतना खौफ क्यों होता?
एक सवाल मेरे भीतर उमड़ने लगा—
"आखिर यह औरत कौन है? और हर दिन इन लोगों को पैसे क्यों देती है?"
सच जो आत्मा को झकझोर दे
एक दिन मुझसे रहा नहीं गया। मैंने तय किया, आज इसका पीछा करूंगा।
जैसे ही स्टेशन पर अंधेरा गहराने लगा, वह बूढ़ी महिला उठी और धीरे-धीरे शहर की तंग गलियों की ओर बढ़ने लगी। मैं चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा।
कुछ ही मिनटों में वह शहर के बदनाम इलाके में प्रवेश कर गई। मेरी धड़कनें तेज हो गईं।
क्या वह वाकई एक वैश्या थी?
अगर नहीं, तो वह यहाँ क्यों आई?
मेरे मन में घृणा उमड़ने लगी, लेकिन फिर भी मैं ठहरा नहीं।
अगले दिन, मैं एक फर्जी ग्राहक बनकर वहाँ पहुँचा। अंदर कदम रखते ही जो नजारा देखा, उसने मेरी रूह तक हिला दी—
🔹 बदबू से भरे कमरे, जिनकी दीवारें धुएँ से काली पड़ चुकी थीं।
🔹 घुंघरुओं की आवाज और ढोल की थाप पर थिरकती अधनंगी लड़कियाँ।
🔹 आँखों में भूख लिए आदमी, जो वेश्याओं को ऐसे घूर रहे थे, जैसे उन्हें निगल जाना चाहते हों।
लेकिन वह बूढ़ी महिला वहाँ नहीं थी।
मैंने और आगे जाकर देखा—
एक अंधेरे कोने में लोहे की सलाखों के पीछे दर्जनों महिलाएँ बंद थीं।
उनकी आँखों में न कोई आशा थी, न कोई शिकायत—बस एक खामोश सिसकती मौत थी। उनमें वह बूढ़ी महिला भी थी।
अब मेरी आँखें खुल चुकी थीं।
उस रात मेरी नींद उड़ गई...
अगले दिन, मैं फिर रेलवे स्टेशन पहुँचा।
वह बूढ़ी महिला वहाँ बैठी थी—अपने ऐल्युमिनियम के कटोरे को पीट-पीटकर लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रही थी।
मैं उसके करीब गया और धीरे से कहा—
"माँ...!"
माँ शब्द सुनते ही वह कांप गई। उसकी आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे।
मैंने प्यार से पूछा,
"आप कौन हैं, माँ? यहाँ कैसे पहुँचीं?"
जो कहानी उसने सुनाई, उसने मेरी रूह तक हिला दी—
"बेटा! मैंने प्यार के नाम पर अपने माँ-बाप को धोखा दिया था। उनके खिलाफ जाकर शादी की और घर से भाग गई। जिस इंसान के लिए सबकुछ छोड़ा, उसने जब मुझसे मन भर लिया, तो धोखे से मुझे कोठे पर बेच दिया...!"
"यहाँ जितनी भी लड़कियाँ दिख रही हैं, सबने प्यार के नाम पर धोखा खाया है। जब हमें यहाँ लाया गया, तो हमने बहुत रोया, गिड़गिड़ाया, लेकिन हमारी चीखों को साजिशों की दीवारों के पीछे दफन कर दिया गया।"
"जब तक जवान थे, तब तक कोठे की शान थे। लेकिन जब शरीर ढल गया, तो हमें सड़कों पर भीख माँगने के लिए छोड़ दिया। जो पैसे भीख में मिलते हैं, उन्हें भी कोठे के दलाल वसूलने आ जाते हैं।"
"और जब हम भीख माँगने के लायक भी नहीं रहते, तो हमें अंधेरी गलियों में छोड़ दिया जाता है, मरने के लिए...!"
"हम वेश्या नहीं हैं..."
"बेटा, हम मजबूर हैं, लेकिन हम गिरी हुई नहीं हैं। हम जबरन इस दलदल में धकेली गईं, लेकिन दुनिया हमें ही गंदा समझती है।"
"काश! हमने अपने माँ-बाप की सुनी होती, काश! हमने एक बार उनकी बात समझने की कोशिश की होती...!"
आज भी हर मोड़ पर हमारी आँखें किसी अपने को तलाशती हैं—
जो हमें इस जिल्लत भरी ज़िंदगी से बाहर निकाल सके।
लेकिन अफ़सोस, हमारा दर्द समाज का मुद्दा नहीं बनता...!
हम बस हर रोज़ कतरा-कतरा मरते हैं...
कल फिर जीने की आस लिए...!
Comments
Post a Comment