शिक्षकों के ट्रांसफर पर प्रशासनिक उलझन: कब खत्म होगा यह इंतजार?
शिक्षकों के ट्रांसफर पर प्रशासनिक उलझन: कब खत्म होगा यह इंतजार?
शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले शिक्षक दशकों से अपने ट्रांसफर की बाट जोह रहे हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं और अधिकारियों के बदलते नियमों के कारण यह प्रक्रिया पूरी तरह ठप पड़ी हुई है।
बदलते नियम, बढ़ती मुश्किलें
शिक्षकों के ट्रांसफर की प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग अधिकारियों और बाबुओं के अपने-अपने नियम हैं। कभी मीटिंग्स में सालों तक चर्चा होती रही, तो कभी सॉफ्टवेयर तैयार करने के नाम पर कई साल बीत गए। एक अधिकारी का नियम दूसरे को स्वीकार्य नहीं होता, और इसी खींचतान में शिक्षक वर्षों से अपने ट्रांसफर का इंतजार कर रहे हैं।
10-12 वर्षों का लंबा सफर, लेकिन नतीजा शून्य
शिक्षकों के ट्रांसफर का मामला पिछले 10-12 वर्षों से लंबित है। हर बार कोई नया नियम या नया सॉफ्टवेयर इस प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना देता है। बाबू लोग अपने नियम बनाते-बनाते खुद ही ट्रांसफर हो जाते हैं, लेकिन शिक्षकों का स्थानांतरण अब तक अधर में लटका हुआ है।
एस. सिद्धार्थ सर का नजरिया और शिक्षकों की पीड़ा
एस. सिद्धार्थ सर को लगता है कि शिक्षकों का ट्रांसफर 2-3 महीने की देरी से हो भी गया तो क्या फर्क पड़ता है। लेकिन शिक्षकों के लिए यह सिर्फ महीनों की देरी नहीं, बल्कि उनके दशकों के संघर्ष का हिस्सा है। यदि अब भी ट्रांसफर नहीं हुआ, तो आने वाले अधिकारी अपने नए नियम लागू कर देंगे और यह प्रक्रिया फिर से अधर में लटक जाएगी।
क्या मिलेगी शिक्षकों को न्याय?
अब सवाल यह उठता है कि शिक्षकों का यह इंतजार कब खत्म होगा? क्या प्रशासनिक उलझनों के चलते शिक्षक यूं ही अपने स्थानांतरण की राह देखते रहेंगे, या फिर कोई अधिकारी इस प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से लागू करेगा? शिक्षा जगत को आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि शिक्षकों को उनकी वाजिब सुविधाएं और स्थानांतरण का अधिकार जल्द मिले। वरना, यह प्रक्रिया एक अंतहीन दायरे में घूमती ही रहेगी।
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